हमारे देश कि शिक्षा वयवस्था ही आज हमारे विकास में अवरोध बन गई है। प्राचीन समय से अगर देश में शिक्षा के स्तर कि बात कि जाए तो ये ज्ञात होता है कि भारतीये शिक्षा का स्तर हमेशा ही पुरे विश्व के लिया प्रेरणा श्रोत था पर आज स्तिथि कुछ और ही है आज प्रेरणा तो दूर है भारत को शिक्षा के छेत्र में निम्न स्तर में रखा जाता है। आज शीर्ष 200 शिक्षण संस्थानो में भारत का एक भी संस्थान शामिल नहीं है। द टाइम्स विश्व यूनिवर्सिटीज़ रैंकिंग (2013) के अनुसार अमरीका का
केलिफ़ोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलॉजी चोटी पर है जबकि भारत के पंजाब
विश्वविद्यालय का स्थान विश्व में 226 वाँ है. हमारे देश में नाम रखने वाले आई आई टी का स्थान 200 में नहीं है कितने दुःख कि बात है कि कभी विश्व गुरु कहे जाने वाले देश के शिक्षण संसथान का ये हाल है।
वर्त्तमान में देश में प्रचलित शिक्षा वयस्था को हम किसे भी रूप में ये नहीं कह सकते कि ये भारतयी शिक्षा पद्धति है और हक़ीक़त भी यही है के ये पद्धति तो अंग्रेजों द्वारा थोपी गई क्लर्क बनाने वाली पद्धति है। अंग्रेजों ने भारत में अपना काम सुचारु रूप से चलने के लिये भारत के युवा को अंग्रजी भाषा में शिक्षित किया इसके पीछे कारण था कि उनको अंग्रेजी जानने वाले भारतीये लोग चाहिये थे। इस काम में वो सफल भी थे और आज हम इस काम में असफल हैं क्योंकि हमे जिस ज्ञान कि जरुरत थी वो हम नहीं अपना पाए। 1947 में देश कि आजादी के बाद हमे अपनी शिक्षा और अपनी आर्थिक नीति कि जरुरत थी पर हमने अंग्रेजों कि नीति अपना ली और उसी का दुष्परिणाम हम आज भोग रहे हैं।
हमारे देश में युवा शिक्षित तो हो जाता है पर ज्ञानी नहीं हो पता है बचपन से ही हमे ऐसे बातें बताई जाती है जिनका कोई व्याहारिक महत्व नहीं होता है पहली से ले कर दसवीं क्लास तक हमे जो कुछ भी पढ़ाया जाता है वो अगर कायदे से पढ़ाया जाऐ तो चार या पांच सालों में पढ़ाया जा सकता है। इसके अतरिक्त हमे ऐसे ऐसे तथ्य बताऐ जाते है जो हमारी गुलामी वाली मानसिकता को प्रदर्शित करती है और सच भी नहीं होती है। जैसे हमे बताया जाता है की भारत खोज वास्को डी गामा ने की थी अब इससे बड़ा झूठ और क्या हो सकता है कि भारत मे जन्मे बच्चे को आप ये बताओ कि आप के देश कि खोज किसी विदेशी ने कि ही तो उसके दिमाग में क्या विचार बैठेगा, बच्चों को बताया जाता है कि कालीदास इज़ शेएक्सपीयर ऑफ़ इंडिया जब कि हक़ीक़त तो ये है कि कालीदास शेएक्सपीयर से 1000 साल पहले अपनी रचना कर चुके थे और ज्ञान के मामले में शेएक्सपीयर से काफी ज्यादा आगे थे। शिकंदर महान था जबकि उसके द्वारा जीता गया इलाक़ा चन्द्रगुप्त मौर्या के इलाके का आधा भी नहीं था। कभी ये बात नहीं बताई जाती है की प्राचीन समय में भू मध्य रेखा भारत के उज्जैन से गुजरती थी और चरक और शुश्रुत जैसे डॉक्टर हमारे देश में थे, नाटकों की पहली किताब नाट्यशास्त्र भारत में लिखी गई थी। भारत के दार्शनिक बहुत महान थे, भारत में चार धर्मों का जन्म हुआ है। हमे हमारे ऊपर राज करने वाले अंग्रेजों के नाम लार्ड शब्द के साथ पढ़ाया जाता है लार्ड विलयम बैंटिक, लार्ड फलने , लार्ड ये , लार्ड वो।
हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा का हाल इतना ख़राब है पर देश में इंजीनियरिंग और एम् बी ऐ कॉलेजेस कि संख्या इतनी तेजी से बढ़ी कि गुणवत्ता घाट गई। आज युवा इंजीनियरिंग और एम् बी ऐ कॉलेजेस से पढ़ के जब नौकरी करने के लिए जाता है तो उसे कंपनी फिर से ट्रेनिंग देती हैं ये उनके स्तर को दर्शाता है। मेडिकल कॉलेज कि तो देश में कमी बनी हुई है, हमसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश चीन है और हमारे देश के बच्चे वहाँ मेडिकल के अध्ययन करने के लिये जाते हैं। आजादी के इतने सालों के बाद भी देश में युवा साक्षरता दर 82 % है जबकि चीन में ये 99. 4 % है जबकि चीन हमसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश है।
पाँच तथ्य जो हमारे देश की शिक्षा वयवस्था कि हक़ीक़त को उजागर करता है
तथ्य 1: स्कूल की पढ़ाई करने वाले नौ छात्रों में से
एक ही कॉलेज पहुँच पाता है. भारत में उच्च शिक्षा के लिए रजिस्ट्रेशन कराने
वाले छात्रों का अनुपात दुनिया में सबसे कम यानी सिर्फ़ 11 फ़ीसदी है.
अमरीका में ये अनुपात 83 फ़ीसदी है.
तथ्य 2: इस अनुपात को 15 फ़ीसदी
तक ले जाने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत को 2,26,410 करोड़ रुपए
का निवेश करना होगा जबकि 11वीं योजना में इसके लिए सिर्फ़ 77,933 करोड़
रुपए का ही प्रावधान किया गया था.
तथ्य 3 : राष्ट्रीय मूल्यांकन और
प्रत्यायन परिषद का शोध बताता है कि भारत के 90 फ़ीसदी कॉलेजों और 70
फ़ीसदी विश्वविद्यालयों का स्तर बहुत कमज़ोर है.
आईआईटी मुंबई जैसे शिक्षण संस्थान भी वैश्विक स्तर पर जगह नहीं बना पाते.
तथ्य 4 : भारतीय शिक्षण संस्थाओं
में शिक्षकों की कमी का आलम ये है कि आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में
भी 15 से 25 फ़ीसदी शिक्षकों की कमी है.
तथ्य 5 : आज़ादी के पहले 50 सालों में सिर्फ़ 44 निजी संस्थाओं को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा मिला. पिछले 16 वर्षों में 69 और निजी विश्वविद्यालयों को मान्यता दी गई.
तथ्य 5 : आज़ादी के पहले 50 सालों में सिर्फ़ 44 निजी संस्थाओं को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा मिला. पिछले 16 वर्षों में 69 और निजी विश्वविद्यालयों को मान्यता दी गई.
मानविकी का है बुरा हाल
भारत में निजी विश्वविद्यालयों की
संख्या तेज़ी से बढ़ रही है. आज़ादी के पहले 50 सालों में देश में सिर्फ़
44 निजी संस्थाओं को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा मिला था जबकि पिछले 16
सालों में ही 69 नए निजी विश्वविद्यालय खुल गए हैं. इन विश्वविद्यालयों में आमतौर पर पेशेवर कहे जाने
वाले प्रबंधन, इंजीनियरिंग, मेडिकल जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं ताकि छात्र
वहां से डिग्री लेकर बाज़ार में नौकरी तलाश सकें. कहने को तो इन विश्वविद्यालयों में
ह्यूमैनिटी यानी मानविकी और सोशल साइंस यानी समाज विज्ञान के विषय भी पढ़ाए
जाते हैं लेकिन उन विषयों में छात्रों की संख्या देख कर अंदाज़ा लगाया जा
सकता है कि इन शिक्षण संस्थानों के लिए ऐसे विषयों की क्या अहमियत है. खुद को भारत का सबसे बड़ा निजी विश्वविद्यालय
बताने वाली पंजाब की लवली प्रोफ़ेशनल यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले 30 हज़ार
छात्रों में से केवल 350 छात्र मानविकी के विषयों की पढ़ाई करते हैं.
वहीं ग्रेटर नोएडा में मौजूद शारदा यूनिवर्सिटी में मानविकी और समाज विज्ञान के विषय पढ़ाए ही नहीं जाते.
स्वाभाविक है कि मोटी फीस के दम पर चलने वाले इन निजी विश्वविद्यालयों में भाषा, साहित्य, दर्शन जैसे मानविकी के विषयों और इतिहास, समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र जैसे समाज विज्ञान के विषयों पर ज़ोर नहीं रहता क्योंकि इन्हें बाज़ार की ज़रूरतों के अनुकूल विषय नहीं माना जाता. इसलिए ज़्यादा पैसे देकर मजबूरी में ही छात्र वहां पढ़ने जाते हैं. निजी क्षेत्र में छात्रों की संख्या के आधार पर बड़ा शिक्षण समूह माने जाने वाले एमिटी ग्रुप के नोएडा कैंपस में सोशल साइंस के छात्रों ने बताया कि दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों में दाखिला नहीं मिलने की वजह से ही उन्हें वहां एडमिशन लेना पड़ा. इन छात्रों का मानना है कि डीयू और जेएनयू जैसे सरकारी विश्वविद्यालयों में पढ़ाई को लेकर जितना खुलापन है और जितना कुछ सीखने को मिलता है, उतना निजी विश्वविद्यालयों के बंद से माहौल में नहीं मिलता. एमिटी के नोएडा कैंपस की वस्तुस्थिति कुछ और ही है. वहां समाज विज्ञान के सभी विषयों में कुल छात्रों की संख्या मात्र 209 है और इतिहास जैसा महत्वपूर्ण विषय वहां पढ़ाया ही नहीं जाता. हां मानविकी के फ़ाइन आर्ट, म्यूज़िक, विदेशी भाषाएं, अंग्रेज़ी जैसे विषय वहां काफ़ी डिमांड में नज़र आए. लवली प्रोफ़ेशनल यूनिवर्सिटी में मानविकी की पढ़ाई साल 2010 में शुरू हुई जबकि समाज विज्ञान के विषय वहां अब भी नहीं पढ़ाए जाते.
एक समय था कि अपने बच्चों को लोग सरकारी स्कूलों में भेजते थे क्योंकि वहां ईमानदारी से शिक्षा दी जाती थी, लेकिन अब इन सरकारी स्कूलों में वही लोग अपने बच्चों को भेजते हैं जो प्राइवेट स्कूलों की भारी फीस नहीं भर सकते.
जिस तरह शिक्षा प्राइवेट हाथों में जाती जा रही है, वो समय दूर नहीं जब उच्च शिक्षा व्यवस्था पर भी निजी हाथों का वर्चस्व हो जाएगा और अगर ऐसा हुआ तो मानविकी और समाज विज्ञान जैसे विषयों का भविष्य क्या होगा - ये एक बहुत बड़ा सवाल है और गंभीर चिंतन की मांग करता है.
स्वाभाविक है कि मोटी फीस के दम पर चलने वाले इन निजी विश्वविद्यालयों में भाषा, साहित्य, दर्शन जैसे मानविकी के विषयों और इतिहास, समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र जैसे समाज विज्ञान के विषयों पर ज़ोर नहीं रहता क्योंकि इन्हें बाज़ार की ज़रूरतों के अनुकूल विषय नहीं माना जाता. इसलिए ज़्यादा पैसे देकर मजबूरी में ही छात्र वहां पढ़ने जाते हैं. निजी क्षेत्र में छात्रों की संख्या के आधार पर बड़ा शिक्षण समूह माने जाने वाले एमिटी ग्रुप के नोएडा कैंपस में सोशल साइंस के छात्रों ने बताया कि दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों में दाखिला नहीं मिलने की वजह से ही उन्हें वहां एडमिशन लेना पड़ा. इन छात्रों का मानना है कि डीयू और जेएनयू जैसे सरकारी विश्वविद्यालयों में पढ़ाई को लेकर जितना खुलापन है और जितना कुछ सीखने को मिलता है, उतना निजी विश्वविद्यालयों के बंद से माहौल में नहीं मिलता. एमिटी के नोएडा कैंपस की वस्तुस्थिति कुछ और ही है. वहां समाज विज्ञान के सभी विषयों में कुल छात्रों की संख्या मात्र 209 है और इतिहास जैसा महत्वपूर्ण विषय वहां पढ़ाया ही नहीं जाता. हां मानविकी के फ़ाइन आर्ट, म्यूज़िक, विदेशी भाषाएं, अंग्रेज़ी जैसे विषय वहां काफ़ी डिमांड में नज़र आए. लवली प्रोफ़ेशनल यूनिवर्सिटी में मानविकी की पढ़ाई साल 2010 में शुरू हुई जबकि समाज विज्ञान के विषय वहां अब भी नहीं पढ़ाए जाते.
'आर्ट यानी कमज़ोर छात्र'
अधिकतर लोगों कि नज़र में लिबरल आर्ट में वही लोग दाखिला लेते
हैं जो पढ़ाई में कमज़ोर होते हैं और उनके लिए नौकरी के बहुत कम विकल्प
मौजूद होते हैं. आम राय यही है कि मानविकी में वही लोग आते हैं जिन्हें
विज्ञान के कॉलेजों में या तो दाखिला नहीं मिल पाया है या उनके माता पिता
बहुत अमीर हैं, इसलिए उन्हें नौकरी की कोई चिंता नहीं है. आईटी कंपनियाँ जिस तरह इंजीनियरों की थोक के भाव
भर्ती करती हैं उसके ठीक विपरीत मानविकी के स्नातक के लिए सिर्फ़ सरकारी
विभागों या शिक्षा के क्षेत्र में ही नौकरियाँ उपलब्ध रहती हैं. भारत में
लिबरल ऑर्ट्स की शिक्षा के न फलफूल पाने का एक और कारण है इसकी शिक्षा का स्तर ।
"निजी विश्वविद्यालयों को लेकर
यूजीसी जो एक नया रेगुलेशन बना रहा है उसमें इस चिंता को बहुत अहमियत दी गई
है और निजी विश्वविद्यालयों से ये उम्मीद रखी गई है कि वो केवल पेशेवर
कोर्स ऑफ़र न करें बल्कि मानविकी और समाज विज्ञान के विषय भी पढ़ाएं जिनसे
व्यक्तित्व का पूर्ण विकास होता है."
देश के नीति निर्माता सिद्धांत रूप से ये स्वीकार
तो करते हैं कि निजी विश्वविद्यालयों में मानविकी के विषयों की स्थिति
चिंताजनक है लेकिन हक़ीक़त ये है कि निजी स्कूलों की तरह निजी
विश्वविद्यालयों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है.एक समय था कि अपने बच्चों को लोग सरकारी स्कूलों में भेजते थे क्योंकि वहां ईमानदारी से शिक्षा दी जाती थी, लेकिन अब इन सरकारी स्कूलों में वही लोग अपने बच्चों को भेजते हैं जो प्राइवेट स्कूलों की भारी फीस नहीं भर सकते.
जिस तरह शिक्षा प्राइवेट हाथों में जाती जा रही है, वो समय दूर नहीं जब उच्च शिक्षा व्यवस्था पर भी निजी हाथों का वर्चस्व हो जाएगा और अगर ऐसा हुआ तो मानविकी और समाज विज्ञान जैसे विषयों का भविष्य क्या होगा - ये एक बहुत बड़ा सवाल है और गंभीर चिंतन की मांग करता है.
"ट्रेनिंग से मैं एक इंजीनियर हूँ जिसने एमबीए भी किया है. लेकिन काश मुझे लिबरल आर्ट्स का भी अनुभव मिला होता. अगर ऐसा हो पाता तो मैं शायद बेहतर इंसान और बेहतर लीडर होता मुझे याद है स्कूल में मेरे इतिहास और भूगोल के शिक्षक पाठ्यपुस्तक से सीधे पढ़ाते थे और लेक्चर के बाद पाठ के अंत में दिए प्रश्नों के उत्तर लिखवा देते थे. मेरे इतिहास में अच्छे नंबर ज़रूर आए थे लेकिन इसके पीछे शिक्षक की भूमिका कम और मेरी विषय में अतिरिक्त रुचि ज़्यादा ज़िम्मेदार थी."
केवी कामथ, पूर्व प्रमुख, आईसीआईसीआई बैंक
भारत के अधिकतर कला छात्रों के लिए यही कहानी
कॉलेजों में भी दोहराई जाती है. हाँ कुछ गिने चुने कॉलेज ज़रूर अपवाद हैं
जहाँ के शिक्षक अतिरिक्त जानकारी पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं. अगर आपको इन
कॉलेजों में दाखिला नहीं मिल पाता तो ले-दे कर आपके पास यही विकल्प बचता है
कि किसी साधारण कॉलेज में दाखिला ले कर अपने पसंद का विषय पढ़ा जाए या फिऱ
किसी मामूली इंजीनियरिंग कालेज का रुख किया जाए.एक साधारण इंजीनियर के लिए एक साधारण समाजशास्त्री या राजनीति शास्त्र के छात्र से बेहतर नौकरी के अवसर मौजूद रहते हैं. कुछ जानेमाने कॉलेजों जैसे सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज, एलएसआर, प्रेसिडेंसी या लॉयोला कॉलेज की बात छोड़ दी जाए, तो बीए में दाखिला लेने में छात्रों की उतनी ही रुचि रहती है जितनी शायद सोमालिया की नागरिकता लेने में.भारत में हावर्ड जैसे उच्च कोटि के शिक्षण संस्थानों की कमी महसूस होती रही है. कुछ वर्षों पहले नेशनल एसोसिएशन ऑफ़ कॉलेजेज़ एंड एम्पलॉयर्स ने नियोक्ताओं के बीच एक सर्वेक्षण किया था जिसमें ये बात निकल कर सामने आई कि वो डिग्री से अधिक योग्यता को तवज्जो देते हैं।
निपुणता तो सीखने से आती है लेकिन अच्छे विचार प्रोफ़ेशनल डिग्री भर से नहीं लाए जा सकते.
आर्ट्स के अंदर भी शायद अर्थशास्त्र की वक़त किसी भी भाषा के साहित्य से अधिक है. साहित्य की पढ़ाई के खिलाफ़ अक्सर ये तर्क दिया जाता है कि इसे तो आप अपने खाली समय में भी पढ़ सकते हैं. लेकिन यह सवाल उभरता है कि हम में से कितने लोग अपने खाली समय में खालिस साहित्य पढ़ते हैं?
सिर्फ़ साहित्य ही लिबरल आर्ट्स की श्रेणी में नहीं आता. इस श्रेणी में इतिहास, दर्शन शास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान और राजनीतिशास्त्र सभी को रखा जा सकता है. अमरीका में तो संगीत, कला और यहाँ तक कि प्राकृतिक विज्ञान (भौतिकी, रसायनशास्त्र और जीव विज्ञान) भी इसी श्रेणी में रखे जाते हैं. आम मध्यम वर्ग तबके में ये एक आम सोच है कि अगर आप विज्ञान नहीं पढ़ना चाहते तो उससे थोड़ा कम बेहतर विकल्प कॉमर्स है. सच्चाई ये है कि कॉमर्स की डिग्री, ह्यूमेनिटीज़ की डिग्री से न तो बेहतर है और न बेकार. ये भी एक भ्रांति है कि कॉमर्स की पढ़ाई से एमबीए में मदद मिलती है. लेकिन ये तथ्य दिलचस्प हैं कि आईआईएम अहमदाबाद के 2012 के बैच में कॉमर्स के 12 फ़ीसदी छात्रों की तुलना में सिर्फ़ 4 फ़ीसदी छात्र आर्ट्स पृष्ठभूमि के थे और पूरे बैच के 75 फ़ीसदी छात्र इंजीनियरिंग करके आए थे.
'मौलिकता की कमी'
इस समय भारत में ऊँचे स्तर के लिबरल आर्ट्स कॉलेज खोले जाने की ज़रूरत है. आईआईटी, आईआईएम और एम्स जैसे संस्थानों के लिए ही ‘उत्कृष्ट संस्थान’ विशेषण इस्तेमाल किया जाता है लेकिन ये हारवर्ड, वॉर्टन या स्टैनफ़र्ड की तरह मल्टी डिसिपलिनरी संस्थान नहीं हैं जहाँ एक परिसर के अंदर ही इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, मेडिसिन और लिबरल आर्ट्स की शिक्षा दी जाती है.अगर आप नौकरी की संभावनाओं को एक तरफ़ कर दें और इंजीनियरों और डॉक्टरों के सामाजिक पक्ष पर ही ध्यान दें तो आप पाएंगे कि इनमें से अधिकतर में रचनात्मकता और मौलिकता का आभाव है।
ये लोग आईटी आउटसोर्सिंग कंपनी के एक अच्छे कर्मचारी तो हो सकते हैं लेकिन ये मामूली कम्यूनिकेटर, विचारक या दार्शनिक साबित नहीं होते हैं. भारत में जहां अक्सर दुनिया में सबसे अधिक तकनीकी स्नातक होने की शेख़ी बघारी जाती है, हंगरी जैसे छोटे देश से कम नोबेल पुरस्कार आए हैं.
मज़े की बात ये है कि हंगरी की ख्याति लेखकों और संगीतकारों की वजह से ज़्यादा है न कि इसके डॉक्टरों या इंजीनियरों की वजह से. एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक कृष्ण कुमार तो यहाँ तक मानते हैं कि भारतीय समाज में लिबरल आर्ट्स पर ज़ोर न दिए जाने के कारण ही भारतीय समाज में असहिष्णुता व्याप्त है.
कोई कविता पढ़ना चाहे या माइक्रोस्कोप से कोई सूक्ष्म चीज़ देखना चाहे या किसी की रुचि अमाल अल्लाना के किसी नाटक को देखने में हो या कोई मध्ययुगीन पांडुलिपी में छिपे किसी रहस्य को ढ़ूँढ़ने में दिलचस्पी रखता हो ये सभी गतिविधियाँ इंसान को स्वतंत्र रूप से सोचने और फ़ैसले लेने में मदद करती हैं. इनसे मनुष्य का दायरा बढता है, वो नए परिपेक्ष्य की खोज करते हैं और अपने दृष्टिकोण को और मज़बूत बनाने के लिए नए साधनों को ईजाद करते हैं.
उदार शिक्षा का अर्थ है अपने आप को पूरी तरह से बदल डालना. लिबरल आर्ट्स की शिक्षा मस्तिष्क को न सिर्फ़ पूरी तरह से आज़ाद करती है बल्कि उन बिंदुओं को जोड़ने में मदद करती है जिनकी तरफ़ पहले आपका ध्यान ही नहीं गया था. इसकी वजह से ही इंसान किसी विषय पर अपनी सोच बना पाता है.
अल्बर्ट आइंसटीन ने सही कहा है, ''कल्पनाशीलता ज्ञान से ज़्यादा ज़रूरी है. ज्ञान संकुचित है, कल्पनाशीलता कालजयी है.''
शोध बना खिलवाड़ पैसे दो, डॉक्टरेट लो
उच्च शिक्षा में रिसर्च या शोध की
भूमिका सबसे अहम होती है. शोध के स्तर और उसके नतीजों से ही किसी
विश्वविद्यालय की पहचान बनती है और छात्र-शिक्षक उसकी ओर आकर्षित होते हैं.
शोध के महत्व पर यूजीसी के पूर्व चेयरमैन और
शिक्षाविद् प्रोफ़ेसर यशपाल कहते हैं, "जिन शिक्षा संस्थानों में अनुसंधान
और उसकी गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता वो न तो शिक्षा का भला कर पाते
हैं और न समाज का."
अमर्त्य सेन (हार्वर्ड विश्वविद्यालय), जगदीश भगवती (केंब्रिज विश्वविद्यालय), हरगोविंद खुराना (लिवरपूल विश्वविद्यालय) ने अपने शोध की वजह से न केवल भारत का नाम रोशन किया बल्कि जिन विश्वविद्यालयों से ये जुड़े, उनकी प्रतिष्ठा को भी इन्होंने आगे बढ़ाया।
कभी भारत में शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान का केंद्र
रहे बिहार के पटना विश्वविद्यालय में आज शोध छात्र और शिक्षक दोनों के लिए
खिलवाड़ बन गया है.
शिक्षक जहां पैसे लेकर शोधकार्य करवा रहे हैं, वहीं छात्र बिना किसी योग्यता के डॉक्टरेट की डिग्री हासिल कर रहे हैं. ये स्थिति केवल पटना विश्वविद्यालय की ही नहीं है.
ऐसे तमाम विश्वविद्यालय हैं जहां पीएचडी थीसिस तो थोक के भाव से जमा हो
रहे हैं, लेकिन उनमें लिखी सामग्री से विषय का कोई भला नहीं हो रहा, वो
केवल यहां-वहां से, इंटरनेट से चुराई सामग्री का संकलन भर होता है जिसे न
तो छात्र गंभीरता से लेते हैं और न ही उनके शोध निर्देशक.
हालांकि इस तस्वीर का दूसरा रुख भी है. शोध की खराब हालत के लिए केवल शिक्षकों का रवैय्या ही ज़िम्मेदार हो ऐसा ही नहीं है. कई बार शोधार्थी भी शोधकार्य के दौरान शिक्षकों को नाकों चने चबवा देते हैं.
छात्र कई-कई महीने शिक्षक से नहीं मिलते, पीएचडी में दाखिला लेकर विश्वविद्यालय की तमाम सुविधाएं ले लेते हैं और साथ ही छुप-छुपाकर नौकरी करने लगते हैं.
यानी कुछ हद तक दोष दोनों तरफ से है. कहीं छात्र शिक्षक के हाथों परेशान हो रहा है तो कहीं शिक्षक छात्र के गैर ज़िम्मेदाराना रवैये से कुपित हैं और इन दोनों ही स्थितियों में असल नुक़सान हो रहा है शोध का.
हालत ये है कि शोध के लगातार गिरते स्तर की वजह से भारत के क्लासिक विश्वविद्यालय कहलाने वाले जेएनयू, एएमयू, बीएचयू और इलाहाबाद जैसे विश्वविद्यालयों की छवि दिन ब दिन खराब होती जा रही है.
बहरहाल, कुल मिलाकर भारत में आज शोध की स्थिति पीठ थपथपाने वाली नहीं कही जा सकती. शिक्षा के निरंतर विकास और उसे समाजोपयोगी बनाने के लिए ये बेहद ज़रूरी है कि छात्र और शिक्षक दोनों की अनुसंधान के प्रति सोच ईमानदार हो और वो विषय में कुछ नया जोड़ने के उद्देश्य से ही इस दिशा में आगे बढ़ें.
शोध महज़ शोध की औपचारिकता के लिए न हो बल्कि उससे वैश्विक स्तर पर अनुशासन को गति मिले. इन सबके लिए सबसे ज़रूरी है नीति नियंताओं की नीयत का साफ़ होना ताकि शोध के प्रति सरकार और लोगों की अवधारणा भी बदले और अनुसंधान से जुड़े लोगों को समाज में आदर की दृष्टि से देखा जा सके.
यानी जिस विश्वविद्यालय में शोध की
गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता उसका महत्व शैक्षणिक तो हो सकता है लेकिन
विषय को आगे बढ़ाने, उसका विस्तार करने और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में
नए आयाम जोड़ने में वो पिछड़ जाता है. लेकिन भारत में उच्च शिक्षा में शोध को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता.
भारत में सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 0.8 फीसदी शोध पर खर्च किया
जाता है जो कि चीन और कोरिया से भी काफ़ी कम है और इसे कम से कम दो फ़ीसदी
होना चाहिए.
ये भी एक तथ्य है कि दुनिया के जितने भी बड़े उच्च
शिक्षा के ऑक्सफ़ोर्ड, केंब्रिज, हार्वर्ड जैसे केंद्र हैं वो अपने शोध के
ऊंचे स्तर और शोधार्थियों की गुणवत्ता की वजह से ही जाने जाते हैं.अमर्त्य सेन (हार्वर्ड विश्वविद्यालय), जगदीश भगवती (केंब्रिज विश्वविद्यालय), हरगोविंद खुराना (लिवरपूल विश्वविद्यालय) ने अपने शोध की वजह से न केवल भारत का नाम रोशन किया बल्कि जिन विश्वविद्यालयों से ये जुड़े, उनकी प्रतिष्ठा को भी इन्होंने आगे बढ़ाया।
शोध का भारतीय समाज में बहुत मान नहीं है.
भारत में वस्तुस्थिति यह है कि पहले के मुकाबले
यहां शोध के क्षेत्र में सुविधाएं बढ़ी हैं. विश्वविद्यालयों में
प्रयोगशालाओं का स्तर सुधरा है, इंटरनेट की सुविधा आज शोधार्थियों को आसानी
से उपलब्ध है, आर्थिक रूप से भी सरकार शोध करनेवालों को पर्याप्त मदद देती
है. विश्वविद्यालय परिसर में इंटरनेट की अच्छी सुविधा है,
लाइब्रेरी में हर तरह की किताब मिल जाती है और दुनिया भर के जर्नल वहां
मंगाए जाते हैं. लेकिन भारत के कई बड़े विश्वविद्यालयों में शोध के लिए ज़रूरी अन्वेषणपरक इस बुनियादी प्रवृत्ति का अभाव-सा नज़र आता है और अन्वेषण को बढ़ावा देनेवाला कोई काम नहीं किया जाता है।
हालांकि इस तस्वीर का दूसरा रुख भी है. शोध की खराब हालत के लिए केवल शिक्षकों का रवैय्या ही ज़िम्मेदार हो ऐसा ही नहीं है. कई बार शोधार्थी भी शोधकार्य के दौरान शिक्षकों को नाकों चने चबवा देते हैं.
छात्र कई-कई महीने शिक्षक से नहीं मिलते, पीएचडी में दाखिला लेकर विश्वविद्यालय की तमाम सुविधाएं ले लेते हैं और साथ ही छुप-छुपाकर नौकरी करने लगते हैं.
यानी कुछ हद तक दोष दोनों तरफ से है. कहीं छात्र शिक्षक के हाथों परेशान हो रहा है तो कहीं शिक्षक छात्र के गैर ज़िम्मेदाराना रवैये से कुपित हैं और इन दोनों ही स्थितियों में असल नुक़सान हो रहा है शोध का.
हालत ये है कि शोध के लगातार गिरते स्तर की वजह से भारत के क्लासिक विश्वविद्यालय कहलाने वाले जेएनयू, एएमयू, बीएचयू और इलाहाबाद जैसे विश्वविद्यालयों की छवि दिन ब दिन खराब होती जा रही है.
बहरहाल, कुल मिलाकर भारत में आज शोध की स्थिति पीठ थपथपाने वाली नहीं कही जा सकती. शिक्षा के निरंतर विकास और उसे समाजोपयोगी बनाने के लिए ये बेहद ज़रूरी है कि छात्र और शिक्षक दोनों की अनुसंधान के प्रति सोच ईमानदार हो और वो विषय में कुछ नया जोड़ने के उद्देश्य से ही इस दिशा में आगे बढ़ें.
शोध महज़ शोध की औपचारिकता के लिए न हो बल्कि उससे वैश्विक स्तर पर अनुशासन को गति मिले. इन सबके लिए सबसे ज़रूरी है नीति नियंताओं की नीयत का साफ़ होना ताकि शोध के प्रति सरकार और लोगों की अवधारणा भी बदले और अनुसंधान से जुड़े लोगों को समाज में आदर की दृष्टि से देखा जा सके.
कुलपतियों की नियुक्ति
साल 1947 में पूरे भारत में कुल
27 विश्वविद्यालय हुआ करते थे. अब उनकी संख्या बढ़ कर 560 के पार पहुंच
चुकी है. लेकिन हर निष्पक्ष विश्लेषक की राय है कि इन सालों में भारतीय
विश्वविद्यालयों की संख्या जरूर बढ़ी लेकिन कुलपतियों के स्तर में भारी
गिरावट आई.
सच ये है कि तथाकथित ‘सर्च कमेटियों’
के अस्तित्व में होने के बाद भी अधिकतर कुलपतियों के चयन का आधार मेरिट न
हो कर राजनीतिक पहुंच, जाति या समुदाय हो गया है.
यह कहना ग़लत न होगा कि कुलपतियों की नियुक्ति सत्ताधारी दलों के राजनीतिक हितों को साधने के लिए की जाती है. इन दिनों एक नया चलन भी देखने में आ रहा है कि
वीसी के पद के लिए रिटायर्ड सैन्य या प्रशासनिक अधिकारियों को तरजीह दी
जाने लगी है, ख़ासकर केंद्रीय विश्वविद्यालयों में.फौजियों का दबदबा
पिछले साल लेफ़्टिनेंट जनरल ज़मीरउद्दीन शाह को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का कुलपति बनाया गया.
उन्होंने एक तरह से पूरी छावनी ही विश्वविद्यालय
परिसर में ला खड़ी की. उनके प्रो वाइस चांसलर रिटायर्ड ब्रिगेडियर हैं तो
उनके रजिस्ट्रार पूर्व ग्रुप कैप्टन.
वर्ष 1996 में लेफ़्टिनेंट जनरल एमए ज़की को जामिया मिलिया इस्लामिया का कुलपति बनाया गया था.
इसी तरह 1980 से अब तक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में आठ कुलपति नियुक्त हुए हैं. इनमें से छह आईएएस, आईएफ़एस या सेना से हैं.
आज़ादी से अब तक दिल्ली विश्वविद्यालय में अब तक सिर्फ़ एक सिविल सर्वेंट को कुलपति बनाया गया है और वो थे 1950 से 1956 के बीच भारत के वित्त मंत्री रहे सीडी देशमुख.
विश्वभारती विश्वविद्यालय में सिर्फ़ एक बार ग़ैर शिक्षाविद को कुलपति बनाया गया था. वो थे भारत के पांचवें मुख्य न्यायायाधीश एसआर दास.
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अब तक किसी आईएएस या जनरल को कुलपति नहीं बनाया गया.
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति हैं लेफ़्टिनेंट जनरल ज़मीरउद्दीन शाह.
केंद्रीय विश्वविद्यालयों की बात छोड़ दी जाए तो राज्यों में कुलपतियों की नियुक्ति स्कैंडल बन कर रह गई है.
राष्ट्रीय ज्ञान आयोग और यशपाल कमेटी दोनों ने कहा है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी विश्वविद्यालय का कुलपति बनने के योग्य नहीं समझा जाएगा अगर उसका नाम इस पद के लिए उपयुक्त राष्ट्रीय रजिस्ट्री में नहीं होगा.
इस रजिस्ट्री को उच्चतर शिक्षा के राष्ट्रीय आयोग (एनसीएचईआर) की देखरेख में रखा जाएगा और वो हर बार जगह खाली होने पर पांच नामों की सिफ़ारिश करेगा.
इस बीच राज्य सरकारों ने इस मुहिम की यह कह कर आलोचना की है कि इससे उनकी स्वायत्ता का हनन होता है.
मलेशिया और हांगकांग जैसे देशों में कुलपति की नियुक्ति विश्वविद्यालय काउंसिल करती है.
ऑक्सफ़र्ड और केंब्रिज विश्वविद्यालयों में भी वाइस चांसलर को विश्वविद्यालय काउंसिल चुनती है जहाँ सरकार के नुमाइंदे अगर होते भी हैं तो बहुत कम संख्या में.
ऑक्सफ़र्ड में अभी तक परंपरा थी कि कुलपति विश्वविद्यालय के भीतर से ही चुना जाता है. वर्ष 2004 में पहली बार जॉन वुड ऐसे कुलपति बने जो ऑक्सफ़र्ड से बाहर के थे.
अभी कुछ ही दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस वर्ष के शुरू में बिहार के पूर्व राज्यपाल देवानंद कंवर के हाथों नियुक्त किए गए 9 कुलपतियों की नियुक्ति को रद्द कर दिया.
एक समय में देश में सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे कुलपति हुआ करते थे
एक अन्य मामले में मधेपुरा के बीएन मंडल विश्वविद्यालय और दरभंगा के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपतियों को बीएड की डिग्री देने वाले जाली महाविद्यालयों को बढ़ावा देने के लिए हिरासत में लिया गया था.
जाली डिग्रियों की बिक्री: इस तरह की बहुत सी शिकायतें हैं कि वीसी के दफ़्तर रजिस्ट्रार के साथ मिल कर परीक्षा के रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ कर जाली डिग्री दे रहे हैं, ख़ास कर इंजीनियरिंग कॉलेजों में.
विश्वविद्यालय के पैसे का ग़बन: अधिकतर कुलपति बाहरी एजेंसियों से विश्वविद्यालय का ऑडिट कराने से हिचकते हैं.
नियुक्तियों और प्रवेश परीक्षा में धाँधली: कॉलेजों में नियुक्ति के रैकेट की शुरुआत अक्सर वाइस चांसलर के दफ़्तर से होती है.
फ़्रेंचाइज़ी की दुकान: अक्सर कुलपति ग़लत लोगों को फ़्रेंचाइज़ का अधिकार देते हैं जो पैसा लेकर डिप्लोमा बेचते हैं.
जाली इंजीनियरिंग डिग्री बेचने का एक मामला वर्ष 1997 में नागपुर में आया था और वहाँ के तत्कालीन कुलपति बी चोपाने को कई उच्चाधिकारियों के साथ अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था.
कानपुर के चंद्रशेखर आज़ाद कृषि और तकनीक विश्वविद्यालय के एक कुलपति को भी नियुक्तियों में गड़बड़ी करने के आरोप में उनके पद से हटा दिया गया था.
उसी तरह महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, कोट्टायम के एक पूर्व कुलपति को राज्यपाल ने आदेश दिया था कि वो बेनामी मालिकों से खरीदी गई संपत्ति के लिए दी गई अधिक कीमत की भरपाई अपने वेतन से करें.
एक अध्ययन के अनुसार भारत के 171 सरकारी विश्वविद्यालयों में से एक तिहाई के कुलपतियों के पास पीएचडी डिग्री नहीं है और उनमें से कई के पास तो आवश्यक शैक्षणिक योग्यता भी नहीं हैं.
वर्ष 1964 में कोठारी आयोग ने सिफ़ारिश की थी कि सामान्य तौर पर कुलपति एक ''जाना माना शिक्षाविद् या प्रतिष्ठित अध्येता होगा अगर कहीं अपवाद की ज़रूरत पड़ती भी है तो इस मौके का इस्तेमाल उन लोगों को पद बांटने के लिए नहीं करना चाहिए जो इस शर्तों को पूरा नहीं करते."
इसे एक विडंबना ही कहा जाएगा कि उस रिपोर्ट के आने के पांच दशक बाद अधिकतर उन्हीं लोगों को विश्वविद्यालयों के ऊँचे पदों के लिए चुना जा रहा है जिनके तार शिक्षा ‘माफ़िया’ से जुड़े हुए हैं.
अब जरुरत है सरकार और आम आदमी के सम्मिलित प्रयास से इस समस्या का समाधान निकलने की।
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